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ट्रम्प की महत्वाकांक्षाएँ और ग्रीनलैंड का भू-राजनीतिक भविष्य: एक गहन विश्लेषण

प्रमुख अर्थशास्त्री जेफरी सैक्स ने डोनाल्ड ट्रम्प की ग्रीनलै

ट्रम्प की महत्वाकांक्षाएँ और ग्रीनलैंड का भू-राजनीतिक भविष्य: एक गहन विश्लेषण
Ekhbary Editor
2 weeks ago
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वैश्विक - इख़बारी समाचार एजेंसी

ट्रम्प की महत्वाकांक्षाएँ और ग्रीनलैंड का भू-राजनीतिक भविष्य: एक गहन विश्लेषण

हाल ही में, जाने-माने अमेरिकी अर्थशास्त्री जेफरी सैक्स ने एक चौंकाने वाला दावा किया है कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपनी अदम्य महत्वाकांक्षाओं के कारण ग्रीनलैंड को 'हड़पने' का प्रयास कर सकते हैं। सैक्स, जो कोलंबिया विश्वविद्यालय में सतत विकास केंद्र के निदेशक भी हैं, ने रूसी समाचार एजेंसी TASS को दिए एक साक्षात्कार में यह बात कही। उनके अनुसार, ट्रम्प अपनी इच्छाओं से पीछे हटने वाले नहीं हैं, और उनका व्यवहार एक चार साल के बच्चे जैसा है, जो अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के लिए एक बेहद अस्थिर दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह टिप्पणी वैश्विक भू-राजनीति में एक ऐसे समय में आई है जब आर्कटिक क्षेत्र का महत्व लगातार बढ़ रहा है और प्रमुख शक्तियां इस ध्रुवीय क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मजबूत करने की होड़ में हैं।

सैक्स का यह विश्लेषण सिर्फ एक अटकल से कहीं अधिक है; यह ट्रम्प के पिछले कार्यकाल के दौरान ग्रीनलैंड को लेकर उनकी व्यक्त की गई रुचि को रेखांकित करता है। यह पहली बार नहीं है जब ग्रीनलैंड अमेरिकी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना है। 2019 में, तत्कालीन राष्ट्रपति ट्रम्प ने खुले तौर पर डेनमार्क से ग्रीनलैंड खरीदने की इच्छा व्यक्त की थी, जिसे डेनिश अधिकारियों ने 'हास्यास्पद' और 'निरर्थक' करार देते हुए दृढ़ता से खारिज कर दिया था। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने उस समय कहा था कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है, जिससे ट्रम्प ने अपनी डेनमार्क यात्रा रद्द कर दी थी। इस घटना ने अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में एक अजीबोगरीब अध्याय जोड़ा था और ग्रीनलैंड के रणनीतिक महत्व को वैश्विक सुर्खियों में ला दिया था।

जेफरी सैक्स की 'चार साल के बच्चे' वाली उपमा ट्रम्प की निर्णय लेने की शैली और विदेशी नीति के प्रति उनके अपरंपरागत दृष्टिकोण पर प्रकाश डालती है। सैक्स का मानना है कि ट्रम्प की महत्वाकांक्षाएं उन्हें किसी भी सीमा तक जाने के लिए प्रेरित कर सकती हैं, जिससे अंतर्राष्ट्रीय स्थिरता गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। यह उपमा ट्रम्प के उन आलोचकों के विचारों से मेल खाती है जो उन्हें आवेगपूर्ण और अप्रत्याशित मानते हैं, खासकर जब बात अंतर्राष्ट्रीय समझौतों और कूटनीति की आती है। ऐसे व्यवहार से वैश्विक शक्तियों के बीच विश्वास का संकट गहरा सकता है और मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।

ग्रीनलैंड, क्षेत्रफल के हिसाब से दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप, डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है। इसकी भू-राजनीतिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है, विशेषकर आर्कटिक क्षेत्र में। यह आर्कटिक महासागर और अटलांटिक महासागर के बीच स्थित है, जो इसे समुद्री मार्गों और रक्षा रणनीतियों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बनाता है। ग्रीनलैंड के पास तेल, गैस, दुर्लभ पृथ्वी धातुओं और अन्य खनिजों के विशाल भंडार होने का अनुमान है, जो इसे आर्थिक रूप से भी आकर्षक बनाता है। जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक की बर्फ पिघलने से नए शिपिंग मार्ग खुल रहे हैं, जिससे इस क्षेत्र का रणनीतिक और आर्थिक महत्व और भी बढ़ गया है। अमेरिका की थुले एयर बेस, जो ग्रीनलैंड में स्थित है, शीत युद्ध के दौरान एक महत्वपूर्ण रक्षा चौकी थी और आज भी मिसाइल रक्षा और अंतरिक्ष निगरानी के लिए महत्वपूर्ण है।

सैक्स की टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब ट्रम्प ने हाल ही में नाटो महासचिव मार्क रुटे के साथ बातचीत के बाद 'ग्रीनलैंड सौदे की रूपरेखा' का उल्लेख किया था। Axios पोर्टल की रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रस्तावित परियोजना द्वीप पर डेनमार्क की संप्रभुता को बनाए रखने का प्रावधान करती है, जबकि द्वीप पर अमेरिकी सैन्य उपस्थिति के संबंध में 1951 के रक्षा समझौते को अद्यतन करने पर ध्यान केंद्रित करती है। यह महत्वपूर्ण अंतर है: 'हड़पने' या 'खरीदने' के बजाय, यह एक मौजूदा सैन्य समझौते को मजबूत करने का संकेत देता है। यदि यह सच है, तो यह ट्रम्प की पिछली 'खरीद' की इच्छा से एक महत्वपूर्ण बदलाव होगा, जो एक अधिक पारंपरिक कूटनीतिक दृष्टिकोण को दर्शाता है। हालांकि, 'सौदे की रूपरेखा' की अस्पष्टता अभी भी अटकलों को जन्म देती है।

अमेरिका के ग्रीनलैंड में रणनीतिक हित कई गुना हैं। इनमें आर्कटिक में रूस और चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करना, महत्वपूर्ण खनिजों तक पहुंच सुनिश्चित करना और अपनी मिसाइल रक्षा क्षमताओं को मजबूत करना शामिल है। आर्कटिक क्षेत्र में रूस की सैन्य उपस्थिति बढ़ रही है, और चीन भी 'ध्रुवीय रेशम मार्ग' के माध्यम से इस क्षेत्र में अपनी आर्थिक और रणनीतिक पैठ बना रहा है। ऐसे में, ग्रीनलैंड पर अमेरिकी प्रभाव को मजबूत करना वाशिंगटन के लिए एक प्राथमिकता बन सकता है। हालांकि, यह सब डेनमार्क की संप्रभुता और ग्रीनलैंड की स्वायत्त सरकार की इच्छाओं का सम्मान करते हुए होना चाहिए।

डेनमार्क ने ग्रीनलैंड पर अपनी संप्रभुता के मुद्दे पर हमेशा एक दृढ़ रुख बनाए रखा है। ग्रीनलैंड को 1979 में स्वशासन का अधिकार मिला, और 2009 में उसे और अधिक स्वायत्तता प्रदान की गई, जिसमें अधिकांश घरेलू मामलों पर नियंत्रण शामिल है। ग्रीनलैंड की अपनी संसद और सरकार है, जो डेनिश राज्य के भीतर काम करती है। ग्रीनलैंड के लोग अपनी पहचान और स्वायत्तता को बहुत महत्व देते हैं, और किसी भी बाहरी शक्ति द्वारा उनके क्षेत्र पर नियंत्रण के प्रयास का कड़ा विरोध करने की संभावना है। अंतर्राष्ट्रीय कानून भी किसी संप्रभु राष्ट्र के क्षेत्र को 'हड़पने' के प्रयासों को अवैध मानता है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतर्राष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों के तहत, बलपूर्वक क्षेत्र अधिग्रहण निषिद्ध है।

ट्रम्प के ग्रीनलैंड संबंधी बयानों के व्यापक अंतर्राष्ट्रीय निहितार्थ हैं। यदि अमेरिका ग्रीनलैंड पर अपने प्रभाव का विस्तार करने के लिए आक्रामक तरीके अपनाता है, तो इससे अमेरिका-डेनमार्क संबंधों में तनाव आ सकता है, जो नाटो के महत्वपूर्ण सदस्य हैं। यह नाटो की एकता को भी कमजोर कर सकता है और यूरोप में अमेरिकी सहयोगियों के साथ विश्वास को कम कर सकता है। इसके अलावा, आर्कटिक क्षेत्र में सैन्यीकरण बढ़ने से क्षेत्रीय स्थिरता प्रभावित हो सकती है और रूस और चीन के साथ तनाव बढ़ सकता है। वैश्विक समुदाय को ऐसे किसी भी कदम पर बारीकी से नजर रखनी होगी जो अंतर्राष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के सिद्धांतों का उल्लंघन करता हो।

निष्कर्षतः, जेफरी सैक्स की टिप्पणी, ट्रम्प की पिछली महत्वाकांक्षाओं और आर्कटिक क्षेत्र के बढ़ते भू-राजनीतिक महत्व को देखते हुए, ग्रीनलैंड पर अंतर्राष्ट्रीय ध्यान केंद्रित करती है। जबकि 'हड़पने' का विचार अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत अकल्पनीय और असंभव है, अमेरिकी सैन्य उपस्थिति को मजबूत करने या आर्थिक सहयोग बढ़ाने के प्रयास अधिक यथार्थवादी हो सकते हैं। हालांकि, ऐसे किसी भी कदम को डेनमार्क की संप्रभुता, ग्रीनलैंड की स्वायत्तता और अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के सम्मान के साथ आगे बढ़ाना होगा। ग्रीनलैंड केवल एक द्वीप नहीं है; यह एक जटिल भू-राजनीतिक पहेली का केंद्र बिंदु है, और इसका भविष्य वैश्विक शक्तियों के बीच सावधानीपूर्वक संतुलन पर निर्भर करता है।